"दर्द अपने -अपने"जीवन संग्राम में जूझते,संघर्ष करते लोगकभी रोते कभी हँसतेकभी मर मर जीते लोग ।
कभी सीनों में धड़कतीउम्मीदों की हलचल,कभी बनते कभी टूटतेदिलों में ताजमहल ।
पत्थर जैसी परिस्थितियों केबनते रहे पहाड़भविष्य उलझा पड़ा है जैसेकाँटे- काँटे झाड़ ।
चेहरे पर अंकित अबपीड़ा की अमिट प्रथाहर भाषा में लिखी हुईयातनाओं की कथा ।
जोश उबाल और आक्रोशसीने में पलते हर दमचुप चुप ह्रदय में उतरतेसीढी सीढी ग़म ।
दर्द की सूली पर टँगाआज किसान औ' मज़दूरहै सबके हिस्से आ रहेज़ख्म और ऩासूर ।
महबूबा से बिछुड़ा प्रेमीखड़ा है शाम ढ़लेग़मों का स़हरा बाँधकरविरह की आग जले ।
कहीं निःसहाय विधवा सीठंडी ठंडी आहकहीं बवंडर से घिरी सुहागिनढूँढे अपनी राह ।
आँगन में बैठी माँ बेचारीदुःख से घिरी हर सूभूख से बच्चे रो रहेक़तरा क़तरा आँसू ।
बोझल बोझल है ज़िन्दगीटुकड़े टुकड़े सपनेयहाँ तो बस पी रहे सभीकेवल दर्द अपने अपने ।।"
कभी सीनों में धड़कतीउम्मीदों की हलचल,कभी बनते कभी टूटतेदिलों में ताजमहल ।
पत्थर जैसी परिस्थितियों केबनते रहे पहाड़भविष्य उलझा पड़ा है जैसेकाँटे- काँटे झाड़ ।
चेहरे पर अंकित अबपीड़ा की अमिट प्रथाहर भाषा में लिखी हुईयातनाओं की कथा ।
जोश उबाल और आक्रोशसीने में पलते हर दमचुप चुप ह्रदय में उतरतेसीढी सीढी ग़म ।
दर्द की सूली पर टँगाआज किसान औ' मज़दूरहै सबके हिस्से आ रहेज़ख्म और ऩासूर ।
महबूबा से बिछुड़ा प्रेमीखड़ा है शाम ढ़लेग़मों का स़हरा बाँधकरविरह की आग जले ।
कहीं निःसहाय विधवा सीठंडी ठंडी आहकहीं बवंडर से घिरी सुहागिनढूँढे अपनी राह ।
आँगन में बैठी माँ बेचारीदुःख से घिरी हर सूभूख से बच्चे रो रहेक़तरा क़तरा आँसू ।
बोझल बोझल है ज़िन्दगीटुकड़े टुकड़े सपनेयहाँ तो बस पी रहे सभीकेवल दर्द अपने अपने ।।"

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